अब लौट गए उस बस्ती में जिस बस्ती से हम दूर हुए..

मधेपुरा।गुलखिलेआजमुरझाएकल,अबलौटचलेउसबस्तीमेंजिसबस्तीसेहमदूरहुए..डॉ.मनोजकुमारकीकविताकीयहपंक्तिकोगुनगुनारहेचौसाकेरंजनकुमारबेहदभावुकनजरआरहेथे।गांवकेचौपालपरबैठेथे।करीब10सालपहलेउन्होंनेगांवछोड़ाथा।दिल्लीमेंकिसीकंपनीमेंकामकरतेथे।कोरोनामहामारीकेआतेहीकामबंदहोगया।बेरोजगारहुएतोआर्थिकतंगीसेपरेशानहोगए।घरकीयादआईतोकिसीप्रकारमुश्किलसेयहांपहुंचे।यहांपहुंचनेकेबादएहसासहुआकिमुश्किलकेघड़ीमेंअपनेहीकामआतेहैं।घरवगांवकेलोगहीसाथदेतेहैं।सबकेसहयोगसेदिनकटरहाहै।

पासखड़ेराजकुमारमहतोनेकहाकिवहभीपंजाबमेंरहतेथे।कंपनीबंदहुईतोमालिकभीगायबहोगए।किसीप्रकार10दिनोंतकतोवहवहांरहे,लेकिनबादमेंपरेशानीहोनेकेबादवहघरवगांवकीओररूखकिए।यहहालसिर्फरंजनवराजकुमारकीहीनहींबल्किजिलेमेंआएकरीबआठहजारसेअधिकलोगोंकीहै,जोदिल्ली,पंजाबसहितअन्यजगहोंपररहकरकामकररहेथे।विपत्तिकीघड़ीमेंगांवकीयादआई।कोरोनाकीआपदामेंपरदेससेमोहभंगकोरोनाकेकारणजिलापहुंचेलोगोंकाअबदूसरेपरदेसोंसेभंगहोरहाहै।इनलोगोंकाकहनाहैकिइसविपदाकीघड़ीमेंहमेंअपनाघरऔरपरिवारऔरगांवहीकामआरहाहै।ऐसेमेंहमलोगअबअपनेगांव,कस्बामेंअबरहकरहीरोजगारकरेंगे।इनलोगोंकाकहनाहैकिगांवकेबाहरभीहमलोगजबदिहाड़ीहीकरतेहैंतोअबवहींकार्ययहांहमलोगोंकोमिलरहाहै।तोहमलोगबाहरक्योंबाहरजाएं।अपनोंकेबीचरहकरकामकाअलगमजाहै।इनलोगोंनेगांवमेंहीरहनेकामनबनारहे।यहींरोजी-रोजगारकीजुगतमेंहैं।यहांभीरोजगारकेकेकईस्रोतहै।पेटकीखातिरकियापरदेशकीओररुखकोरोनाकेकारणबाहरसेआएंलोगनेबतायाकिपहलेहमलोगोंकोयहांरोजीरोजगारमेंकाफीकठिनाईकासामनाकरनापड़ताथा।यहांतककीभोजनकीसमस्याउत्पन्नहोजातीथी।इसलिएहमलोगोंबाहरचलेगएथे।वहांपैसातोमिलताथापरसुकूननहींथा।एकतोकामऊपरसेघरवालोंकीचिताहमलोगोंकोहमेशासतातीथी।सरकारभीपहलेहमलोगोंकीतरफध्याननहींदेतीथी।परअबसबकुछबदलरहाहै।अबगांवोंमेंभीरोजी-रोजगारकेनएद्वारखुलरहेहैं।ऐसेमेंपरिवारवालोंकेसाथगांवमेंभीअपनीरोजीरोटीकीतलाशबेहतरविकल्पहै।

गांवकीजिदगीलगनेलगीप्यारी

बाहरसेआएंलोगोंनेबतायाकिबाहरमेंहमलोगोंकोहमेशाअपनेपरिवारकीचितासतातीरहतीथी।परअबगांवोंमेंजबरोजी-रोजगारमिलनेलगाहैतोबाहरक्योंजाएं।गांवकीजिदगीप्यारीहै।अपनोंकासाथहै।सुख-दुखमिलकरसहतेहैं।जबआमदनीकानयारास्तायहांखुलरहाहैतोहमबाहरक्योंजायाजाए।

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